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कुछ पुराने सपने

वक़्त के पन्नों में सिमटी
किसी पुरानी कहानी में
कुछ सपने छिपकर
जिन्दगी के साथ चले जा रहे है
बस चले जा रहे है

किस्मत के दरवाज़े पर
दस्तक दे कर
मन को गुदगुदा कर
फिर चले जा रहे है
बस चले जा रहे है

बंद हाथो से वक़्त को
थमने की नाकाम कोशिश कर
थक सा गया हूँ
पर फिर भी वो सपने
फिर आकर मन को
हंसा कर चले जा रहे है
बस चले जा रहे है

वक़्त के पन्नों में कुछ सपने जिए जा रहे है
बस जिए जा रहे है

जीवन का सच

वक़्त के साये मे धीमे से बहते
जीवन के पलों को
हाथो की मुट्ठी में थामने का
असफल सा प्रयत्न करते हुए
हम विचार कर रहे है
भविष्य के सपनों का

नित नए सपने संजोये
कुछ पाने के ख्वाहिश लिए
जीवन की बाधाओ से
लड़ने का साहस बटोर
हम जीए चले जा रहे है

कभी अपनों का साथ लिए तो
कभी परायों को अपना बना
आगे ही आगे बड़े जा रहे है
पर अब तो ज़रा ठहरो
ज़रा सोचो
आखिर क्यों और किस के लिए
इतना भाग रहे हो
किस के लिए वर्तमान की बलि चदाये
भविष्य के सपने बुन रहे हो

भविष्य वर्तमान के अस्तित्व में ही बनता है
पर क्या उसके लिए वर्तमान का बलिदान ज़रूरी है
जीवन के इस द्वन्द में कुछ खोने पाने का हिसाब रखना क्या ज़रूरी है
आखिर हम क्या कर रहे है और क्यों कर रहे है
क्या कभी हमने सोचा है, विचार किया है
अगर नहीं तो ज़रा सोचिये
और जीवन के इन पलों को जीवन भर के लिए जी लीजिये

उद्देश्य

जाने किन किन राहो में भटकते रहे है हम
कुछ पाने की ख्वाहिश में खुद से लड़ते रहे है हम
जीवन की झूठी खुशियों के पीछे अपनों को छोड़ आये हम
और आज फिर उन्ही बीते लम्हों को क्यों याद कर रो रहे है हम

स्वार्थी इस दुनिया में स्वार्थी हो गए है हम
अपनों से ज्यादा पैसे के गुलाम हो गए है हम
लक्ष्मी जी की पूजा तो हर रोज़ करते है हम
पर क्या कभी दूसरो के लिए जीते है हम

दूसरो की छोटी सी मदद को हम बड़ा बता देते है
और शायद सिर्फ दिखावे के लिए झूठा मुखुटा पहन लेते है हम
सामने से किसी की तारीफ करने में शर्मा जाते है हम
पर टिवटर पर बड़े टिवट किया करते है हम

सोशल नेट्वर्किंग साइट्स पर बड़े एक्टिव रहते है हम
और दिन पर ऑरकुट और फेसबुक पर कमेन्ट किया करते है हम
दोहरी पहचान बनाने में समझदार है हम
पर क्या किसी को फ़ोन लगाने में तैयार है हम

दोस्तों से काम का बहाना किया करते है
और घर वालो को पढाई का प्रेशर बताया करते है
पर रात भर बैठकर हम गप्पे मारा करते है या मूवी देखा करते है

ग्लोबल इकोनोमी की बाते करते रहते है हम और
किसी मल्टीनेशनल में जाने सपने देखा करते है हम
पैसा कमाना ही शायद जीने का एकमात्र मकसद रह गया है
और शायद यही पढने का उद्देश्य रह गया है

गुमशुदा पल

कुछ गुमशुदा पलों की तलाश में
कब से भटक रहे है हम
जाने क्यों और कहाँ किसे ढूंढ़
रहे है हम

मंजिल पाने की ख्वाहिश में
खुद को ही भूल गए है
और राह भटकते भटकते
लापता हो गए है हम

मन के बंद दरवाजों को खोल पाने में
नाकाम है हम
और दूसरो को अपना हाल समझाने में
बेकार है हम

बदलते वक़्त के साए में
बदल गए है हम
पर अपनों के लिए आज भी
वहीँ है हम

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