अक्टूबर 20, 2009 संकेत जैन द्वारा
जाने किन किन राहो में भटकते रहे है हम
कुछ पाने की ख्वाहिश में खुद से लड़ते रहे है हम
जीवन की झूठी खुशियों के पीछे अपनों को छोड़ आये हम
और आज फिर उन्ही बीते लम्हों को क्यों याद कर रो रहे है हम
स्वार्थी इस दुनिया में स्वार्थी हो गए है हम
अपनों से ज्यादा पैसे के गुलाम हो गए है हम
लक्ष्मी जी की पूजा तो हर रोज़ करते है हम
पर क्या कभी दूसरो के लिए जीते है हम
दूसरो की छोटी सी मदद को हम बड़ा बता देते है
और शायद सिर्फ दिखावे के लिए झूठा मुखुटा पहन लेते है हम
सामने से किसी की तारीफ करने में शर्मा जाते है हम
पर टिवटर पर बड़े टिवट किया करते है हम
सोशल नेट्वर्किंग साइट्स पर बड़े एक्टिव रहते है हम
और दिन पर ऑरकुट और फेसबुक पर कमेन्ट किया करते है हम
दोहरी पहचान बनाने में समझदार है हम
पर क्या किसी को फ़ोन लगाने में तैयार है हम
दोस्तों से काम का बहाना किया करते है
और घर वालो को पढाई का प्रेशर बताया करते है
पर रात भर बैठकर हम गप्पे मारा करते है या मूवी देखा करते है
ग्लोबल इकोनोमी की बाते करते रहते है हम और
किसी मल्टीनेशनल में जाने सपने देखा करते है हम
पैसा कमाना ही शायद जीने का एकमात्र मकसद रह गया है
और शायद यही पढने का उद्देश्य रह गया है